असमानता की स्थायी अभिशप्तता झेलता भारत
January 6, 2020 • Manohar Manoj


असमानता की स्थायी अभिशप्तता झेलता भारत
मनोहर मनोज
वैसे तो हमारे भारत देश के पब्लिक डोमेन में एक तरफ गरीबी, बेरोजगारी, अपराध, शोषण, अन्याय के मुद्दे तो दूसरी तरफ भ्रष्टाचार, अत्याचार, दूराचार, कदाचार, अनाचार, व्याभिचार, बलात्कार, तिरस्कार जैसे अनेकानेक मौजू पिछली एक शताब्दी से अनवरत चर्चाएमान रहे हैं। परंतु ये समस्याएं दुनिया के और कई हिस्सों में रही हैं जिनपर भारत सहित दुनिया के सभी देशों की सरकारों और इनके समाज व सिस्टम ने अपने अपने प्रयास के जरिये कम या बेसी काबू भी पाया है। परंतु भारत जैसे देश के साथ एक ऐसी सामाजिक आर्थिक विसंगति पुरजोर तरीके से चस्पा है जिसकी मिसाल तो दुनिया के किसी हिस्से में शायद हीं मिले। यह मसला है देश में विराजमान गैर बराबरी और असमानता का। भारत में गैर बराबरी और असमानता का मंजर किसी वामपंथी विचारधारा की जुमलेबाजी का नमूना नहीं है बल्कि यह तो भारत की उस सामाजिक-आर्थिक वस्तुस्थिति और दूर्दशा को इंगित करती है जहां समाज के निचले पायदान पर स्थित करीब ८० से ९० फीसदी आबादी की आमदनी, संपत्ति, उपभोग बेहद मामूली है। और सबसे हैरतनाक बात ये है कि इन वर्गों को प्राप्त अवसर, बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता और मानव विकास की परिस्थितियां तथा सरकारों से स्थानांतरित संसाधन इनके मौजूदा स्थिति को बदलने में या तो नाकाम है या फिर नाकाफी हैं। दूसरी तरफ १० से २० फीसदी उच्चस्थ आबादी की सामाजिक आर्थिक मानकों पर हासिल प्रगति अनेकानेक प्रगतिशील करारोपण के बावजूद निम्र वर्ग की तुलना में इन्हें अनवरत तीव्र बनाये हुए है। इसका नतीजा ये है भारत में अमीर जहां कई गुना और अमीर बन रहा है वही गरीब वर्ग जहां है, वही है या उसकी प्रगति दर मामूली है। नतीजा भारत में असमानता एक संरचनात्मक स्वरूप में मौजूद है चाहे आमदनी के स्तर पर हो, उपभोग के स्तर पर हो या सामाजिक आर्थिक विकास के किसी भी मानक पर हो। यह बदस्तुर कायम है बल्कि बढती जा रही है।
भारत में तमाम मानकों पर विराजमान असमानता वृहद स्तर पर चाहे वह शहरी व ग्रामीण आबादी के बीच झलकता हो, खेती व उद्योग के बीच दिखता हो, संगठित व असंगठित वर्ग के कर्मचारियों के बीच हो, व्हाईट कालर व ब्लू कालर श्रमिकों के बीच हो, उंची जाति व वंचित जमात के बीच हो, खानदानी अवसर प्राप्त व आम संघर्षी लोगों के बीच हो, हिंदी व अन्य भारतीय भाषा माध्यम व अंग्रेजी माध्यम से पढे लोगों के बीच हो, नेता व कार्यकर्ता के बीच का हो, बड़े कारपोरेट उद्योग व छोटे कुटीर उद्योग के उद्यमी व श्रमिक के बीच का हो, महानगरों व विदेशों में काम करने वाले कामगार और छोटे शहरों व कस्बों में काम करने वाले कामगारों के बीच हो, यह दरार एक स्थायी शक्ल ले चुका है। भारत के पब्लिक डोमेन में इस पर बड़ी बड़ी बाते जरूर हो जाती हैं परंतु इन असमानताओं क ो स्थायी रूप से पोषित करने वाली हमारी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व प्रशासनिक व्यवस्थाएं केवल निहित स्वार्थी व अवसरवादी तत्वों को पोषित कर रही हैं । जहां हमे यह दिखता है जिसकी लाठी उसकी भैंस चलती है, जहां  जुगाड़ और भाई भतीजावाद चलता है। जहां सामंती ठाटबाट और अर्दली सेवादारों का आलम दिखता है। जहां मठाधीश और चेलों की दुनिया है। जहां की सार्वजनिक संस्थाओं की कार्य संस्कृति पैरवी, चमचागिरी सिफारिश और जुगाड़ पर रची बसी हुई है। जहां जातीय व गुटीय आग्रह व दूराग्रह चरम पर हैं। जहां सार्वजनिक कार्यालयों की संस्कृति निरीह निर्धन और निरक्षर जनता के प्रति तनीक भी सेवा भावी और संवदेनशील नहीं दिखती। ऐसे में देश में विराजमान असमानता और वर्गीय खाई निरंतर गहरी, चौड़ी और स्थायी होती जा रही है। कहना ना होगा भारतीय संविधान की प्रस्तावना के जिस वाक्य का संस्थागत, नीतिगत व कार्यगत तरीके से सबसे ज्यादा उल्लंघन हुआ है वह है अवसर की समानता का। आज भारत देश की सर्वांगीण व्यवस्था का सबसे बड़ा जो सच है वह है अवसर की असमानता।
अभी भारत के अलग अलग वर्ग कामगारों के वेतन में विराजमान असमानता का जो सूचकांक जारी हुआ है, उससे भारत को अच्छे से समझने वालों के लिए हैरानी नहीं होगी परंतु वो लोग जिन्हें भारत की सामाजिक प्रगति को लेकर खुशफहमी है, उन्हें बड़ी हैरानी होगी। यह वल्र्ड इनइक्विटी इन्डेक्स बताता है कि भारत में १० फीसदी कामगारों की आबादी ऐसी है जिसकी आमदनी महीने में सिर्फ १६५६ रुपये यानी करीब केवल ५५ रुपये प्रति दिन है। देश में १० से २० फीसदी कामगार आबादी महज २६५५ रुपये यानी ८० रुपये प्रति दिन है। २० से ३० फीसदी कामगारी आबादी की आमदनी महज ३३८९ रुपये यानी करीब ११० रुपये प्रति दिन। ३० से ४० फीसदी कामगार आबादी की आमदनी करीब ४००० रुपये मासिक यानी १३० रुपये प्रति दिन। ४० से ५० फीसदी कामगार की आमदनी ४७०० यानी करीब १६० रुपये प्रति दिन है। ५० से ६० फीसदी आबादी की आमदनी ५६६१ रुपये यानी करीब १८५ रुपये प्रति दिन है।
देश में २३० रुपये प्रतिदिन की कमाई करने वाले केवल ३० से ४० फीसदी कामगार हैं जबकि २८० रुपये प्रतिदिन की कमाई केवल २० से  ३० फीसदी श्रमिक कर पाते हैं। गौरतलब है कि भारत के अधिकतर राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी ११ से १४ हजार के बीच है जो देश के क ेवल १० से २० फीसदी कामगारों को सुनिश्चित हो पाती है। जबकि थोड़ी बेहतर मजदूरी जो पढे लिखे कुशल श्रमिक जो सरकार या कारपोरेट में नियुक्त हैं उनकी संख्या महज ५ से १० फीसदी है जिनकी औसत मासिक आमदनी २७७८० रुपये है। 
यह कहा जाता है कि भारत तेजी से बढते मध्य वर्ग का देश बन रहा है। इसके तहत एक बेहतर औसत वेतन ६३००० रुपये निर्धारित किया गया है, परंतु यह रकम तो भारत के केवल १ से ५ फीसदी कामगारों को मयस्सर है।
यदि हम दुनिया में घोर असमानता के मुल्क भारत में बेहतर सैलरी व पर्क वाले कामगारों की बात करें तो उसके तहत करीब दो लाख माहवार पाने वाली कामगार आबादी देश के कुल कामगारों की महज १ से ५ फीसदी है जबकि हाई सैलरी यानी करीब ४० लाख माहवार पाने वालों की कामगार आबादी देंखे तो वह महज ०.०१ से ०.०५ फीसदी है। कुल मिलाकर लब्बोलुआब ये है कि देश की करीब आधी श्रमशक्ति ५००० प्रति माह, ८० फीसदी श्रमशक्ति ८००० प्रति माह तथा ९० फीसदी कामगार महज १२००० रुपये माहवारी पर काम कर रहे हैं।
जाहिर है उपरोक्त परिस्थितियां भारत में असमानता को एक ऐसा संस्थागत व संरचनात्मक स्वरूप प्रदान कर रहीं  है जिससे उबर पाना भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था के लिए असंभव सरीखा है। और यह असमानता केवल आमदनी के तौर पर नहीं बल्कि इससे प्रभावित जीवन स्तर, सामाजिक स्टेटस,  शिक्षा स्वास्थ्य व सामाजिक सुरक्षा तथा उनकी प्रगति दर सब जगह प्रमुखता से विराजमान हैं। जाहिर है इन स्थितियों से देश में शिक्षा नीति, श्रम नीति, रोजगार नीति, प्रशिक्षण नीति के सामने एक सामने एक बड़ा प्रश्र चिन्ह है।
लेखक नियमित कॉलमकार के साथ सुप्रसिद्ध पुस्तक ए क्रूसेड एगैन्स्ट करप्शन के लेखक हैं