मूल समस्या कश्मीर में नहीं, विभाजन में छिपी
September 10, 2019 • Manohar Manoj

मूल समस्या कश्मीर में नहीं, विभाजन में छिपी

मनोहर मनोज

भारत पाकिस्तान के बीच हुए एक बड़े घटनाक्रम का पटाक्षेप। आखिर हुआ क्या? भारत ने रात के घटाटोप अंधियारे में पाकिस्तान के कथित आतंकी प्रशिक्षण कैंपों पर बमवर्षक विमानों से हमला किया। इसके जबाब में पाकिस्तान ने आतंकी कैंपों के अस्तित्व से इनकार करते हुए इसे अपनी संप्रभूता पर हमला बताकर अगले दिन तडक़े भारत पर जबाबी हवाई हमला किया। इस हमले में भारत व पाकिस्तान के दोनो विमान एक दूसरे को भेदते हुए ध्वस्त हो गये पर दोनो विमानों के पायलट पाकिस्तान की सरजमीन पर पाराशूट के जरिये उतरे। भारतीय पायलट को तो पाकिस्तान ने कथित शांति कूटनीति का मोहरा बनाकर भारत को सौंप दिया और पाकिस्तानी पायलट को पाकिस्तान में हिंदुस्तानी पायलट समझकर उसकी पीट पीट कर हत्या कर दी।

सवाल ये है कि भारत और पाकिस्तान दोनों क ो इस घटनाक्रम के जरिये क्या हासिल हुआ। भारत के परिप्रेक्ष्य में कश्मीर में रोज ब रोज जो आतंकी हमलें हो रहे हैं जिसमें जिहादियों से भिड़ते हुए भारत के सैन्यकर्मियों की निरंतर जानें जा रही हैं। पहले उरी में भारत के बीस सैनिक और अभी एक बड़े आतंकी फिदाइन हमले में पुलवामा में करीब चालीस जवानों की मौतें हुई। भारत के मुताबिक इन सभी आतंकी हमलों को पाकिस्तान स्थित तीन बड़े आतंकी संगठनों लश्करे तौएबा, जैशे मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन द्वारा अंजाम दिये जा रहे हैं। पुलवामा हमले के बाद भारत की हुकूमत ने पहले तो घरेलू स्तर पर कश्मीरी अलगाववादी नेताओं की सरकारी सुरक्षा व्यवस्था वापस लेने और सांप्रदायिक जमाते इस्लामी को प्रतिबंधित कर इनके नाम से अंर्जित संपत्ति को जब्त किया और पहली बार पाकिस्तान में घूसकर आतंकी कैंपों पर हमला करने की पहल की। इस अभूतपूर्व पहल का भी आखिर क्या अंजाम मिला। कैंपों पर किये गए हमले में तीनों आतंकी सरगनाओं अजहर मसूद, हाफिज सईद और सैयद सलाहुद्दीन का नरमूंड तो नहीं मिला और उनके ट्रेनिंग प्राप्त करने वाले सभी अमलों में से कितने का खात्मा हुआ भी या नहीं, इसका कुछ नहंी पता। कहना ना होगा उरी के हमले के बाद भारत की पैदल सेना ने घूसकर जो सर्जिकल स्ट्राइक की, उसमे आतकी लांचिंग पैडों को नेस्तानाबुद किये जाने तथा करीब 35 आतंकियों को मौत के घाट उतारने के बावजूद कश्मीर में घूसपैठ में कमी तो दूर उसमे और इजाफा हुआ और भारतीय सैनिकों के साथ उनके मुठभेड़ में और बढोत्तरी ही दर्ज हुई। अभी अभी पुलवामा के बाद जो भारत ने पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक की उससे कश्मीर में भारतीय जवानों के साथ आतंकियों के मुठभेड़ में कमी नहीं बल्कि और इजाफा हुआ। तो फिर इन दोनो स्ट्राइक के मायने क्या हुए यदि इससे कश्मीर में आतंकियों के आका का कुछ ज्यादा बिगड़ा ही नहीं। क्या ये दोनो पहल क्या भारतीय सेना की शहादत की कीमत पर मोदी सरकार की राजनीति चमकाने के लिए आयोजित किये। क्या ये घटनाएं सोशल मीडिया पर मोदी के भक्तों के जयकारे मनाने के लिए आयोजित किये गए। भारतीय सेना कश्मीर की रक्षा में बलिदान दे रही है, उसमे वह चाहे जितनी सफल हो या नहीं, उसका श्रेय लेने का हकदार कोई राजनीतिक नेतृत्व कैसे बन सकता है। हां यदि उपरोक्त तीनों आतंकी आकाओं के नरमूंड आप लाने में सफल होते हैं तो फिर राजनीतिक नेतृत्व इसका श्रेय लेने का हकदार बनता जैसे ओबामा को ओसामा आपरेशन के जरिये श्रेय मिला। आपने अमेरिका इजरायल के सरकारों की तरह रेटरिक तो दिखाया कि भारत बदला लेगा पर उससे ना तो समूचित हासिल हुआ ना ही यथोचित।

अब हम पाकिस्तान के नजरिये से बात करें तो उनके लिए कश्मीर भारत से हुए उनके पार्टिशन का अनफिनिश्ड एजेंडा यानी उनके विभाजन का एक अपूरित एजेंडा है। सबसे पहले भारत पाक का विभाजन एक सांप्रदायिक विभाजन था जिसके तहत भारत के सुदूर पूर्व स्थित मुस्लिम बहुल बांगलादेश की भी मख्तारी हासिल हुई थी पर वही बांगलादेश बाद में सांप्रदायिक के बजाए सांस्कृ तिक आधार पर पाकिस्तान से विलग हो गया और 1971 के युद्ध में एक मुसलमान देश ने अपने ही एक हिस्से के करीब तीस लाख मुसलमानों की हत्या की और हजारों औरतों की अस्मत लूटी। तो पाकिस्तान के इस्लाम के आधार पर एक नया राष्ट्र बनाने के ख्याल को भारी चोट पहुंची। दूसरी ओर भारत राष्ट्र राज्य के लिए देश का सांप्रदायिक विभाजन उसके आजादी हासिल करने के सारे अरमानों पर पानी फेरने के समान। भारत ने मुस्लिम बहुल व रजवाड़ा शासित कश्मीर का जो वरण किया वह परिस्थतिजन्य तरीके से हुआ। भारत ने कश्मीर पर अपना वर्चस्व अपना स्थापित किया उसके पीछे भारत का मंतव्य कही ना कही विगत के सांप्रदायिक विभाजन को नकारे जाने क ा द्योतक है साथ ही इस बात का भी द्योतक है कि भारत को मुस्लिम संप्रदायवादियों द्वारा विभाजित किये जाने के बावजूद यह एक धर्मनिरपेक्ष देश बना रहा बल्कि इसके इर कोने में मुस्लिम धमार्वलंबी रहते हैं जिनकी संख्या पाकिस्तान व  बांगलादेश की आबादी के करीब करीब बराबर है।

ऐसे में कश्मीर में चल रहा अलगाववाद कोई नये सिरे से उत्पन्न हुआ मसला नहीं है बल्कि यह मसला पाकिस्तान के विभाजन का ही रक्तबीज है जो कश्मीर को मस्लिम बहुल होने की वजह से या तो भारत से अलग होने की बात कर रहा है या फिर इस्लामी राष्ट्र पाकिस्तान के करीब जाने की कवायद कर रहा है। आखिर जम्मू तो इस अशांत रियासत में कश्मीर से पहले से जुड़ा नाम है वह क्यों नहीं अलग होने की बात कर रहे हैं जाहिर है उन्हें हिंदू बहुल भारत के वह अपने आप को रूहानी रूप से करीब पाते हैं, पर कश्मीर को या तो अलग या फिर पाकिस्तान के करीब।

पाकिस्तान के नजरिये से देखें तो वह समझता है कि उन्होंने 1971 में बंगाल को इसीलिए खोया क्योंकि वह सांस्कृतिक व राजनीतिक दोनो स्तर पर  पंजाबी बहुल पाकिस्तान के मातहत नहीं आ पा रहा था परंतु मुस्लिम बहुल कश्मीर उसकी सीमा से लगा हुआ है अत: वह उसे हासिल करने के लिए सभी कूरबानी करने को तैयार है। संवैधानिक व वैधानिक तथा यहां तक की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर पर पाकिस्तान का आधिपत्य नहीं है। क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का भारत से पहले पाकिस्तान से पहले उल्लंघन किया हुआ है इसी वजह से उसने कबायलियों द्वारा कब्जा किये गए कश्मीर से अपने आप को बेदखल नहीं किया जो उसे प्रस्ताव के मुताबिक करना था। इतना ही नहीं पाकिस्तान ने अति आत्मविश्वास में भारत पर कश्मीर को लेकर तीन बार हमले किया कि हम भारत को परास्त कर देंगे। परंतु पाकिस्तान को पता है कि उसके कश्मीर पर जिहाद की नीति यानी छद्म युद्ध की नीति सबसे माकूल बैठती है जिसके जरिये वह अक्टूबर 1947 में कश्मीर का करीब चालीस फिसदी हिस्सा हासिल करने में कामयाब हो गया और इसी का पूर्वी अक्शाई चीन का हिस्सा चीन को सौपकर चीन से सामरिक संपर्क जोडऩे का मकसद भी हासिल कर लिया। आज भी पाकिस्तान का यही मानना है कि वही 1947 के छद्म युद्ध की दूसरी कड़ी करगिल थी जिसे पुन: हासिल करने के लिए भारत को युद्ध करना पड़ा। अभी पाकिस्तानी हुकूमरानों का यह दृद्व विश्वास है कि कश्मीर का लक्ष्य उन्हें उनकी सेना नहीं बल्कि उसकी छाया में पल व चल रहे आतंकी गूट ही हासिल करेंगे। अभी इमरान खान की भारत में जो तारीफें हो रही है आखिर उन्होंने उन आतंकी गुटों पर नकेल कसने को लेकर कौन सी ऐसी कोई पहल कर दी है। वह पाकिस्तान जो भारत के मृत सैनिक के शव को क्षत विक्षत कर लौटाता था उसने यदि अमेरिका के दबाव में या भारत पर अपनी नैतिक बढ़त हासिल करने के लिए गिरफतार भारतीय पायलट अभिनंदन को लौटाया है, उसके जरिये वह भारत क ी सैन्य आक्रामकता को कम करने का ही प्रयास है। और कुछ नहीं।

भारत और पाकिस्तान आज जो कश्मीर पर लड़ रहे हैं, उसके तह में जाने की जरूरत है। यह लड़ाई कभी बांगलादेश को लेकर हुई। कभी खालिस्तान को लेकर हुई। अब कश्मीर को लेकर हो रही है। आने वाले वक्त में सिंध और बलूचिस्तान को लेकर हो सकती है। पर इसका असल जिम्मेवाद कौन है। इसके जिम्मेवाद मुस्लिम संप्रदायवादी व मुस्लिम लीग भी नहीं थी, इसकी असल जिम्मेदार तो ब्रिटिश साम्राज्य थी जिसने भारत जैसे देश बड़े देश पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए फूट डालों और राज करो की नीति पर अमल किया और भारत के दूसरे सबसे बड़े संप्रदाय मस्लिमों को एक अलग देश का सपना  ना केवल परोसा बल्कि उसे अंजाम दिया। इसी का नतीजा है कि भारत व पाकिस्तान के बीच पिछले सत्तर साल में चल रहे द्वंध में केवल कश्मीर पर कश्मकश नहीं चल रही है बल्कि भारत को भी पाकिस्तान के अलगाववाद में दिलचस्पी है और पाकिस्तान को भारत के अलगावाद मेें। क्या यह सही नहीं है कि भारत व पाकिस्तान उस ब्रिटिश साम्राज्यवाद के नापाक मंसूबे की वजह से उस संप्रदायिक विभाजन के नतीजे के आज भी भुगत रहे हैं और ना जाने आगे कब तक भुगतेंगे। आज भी भारत व पाकिस्तान के बीच के द्वंध उनक ी हुकूमतों व सियासतदानों के बीच हैं ना कि उनके आवामों के बीच। यह बात बिल्कुल ही सही है कि एक पाकिस्तानी नागरिक भारत से गए मेहमान की जो मेहमाननवाजी करता है वह एक भारतीय पाकिस्तानी मेहमान की नहीं कर पाता। अगर नवजोत सिद्धू यह कहते हैं कि मेरी खान पान व जीवन शैली लाहौर के ज्यादा करीब जाती है ना कि चैन्नई के। ऐसा नहीं है कि सिद्धू ऐसा कहकर कोई राष्ट्रविरोधी हो जाते हैं, यह एक तथ्य है जो उन्होंने कही है। क्योंकि जहां तक राष्ट्रवाद की बात है तो उस दौर में जब पाकिस्तानी क्रिकेट टीम का भारत पर दबदबा होता था उस दौर में इमरान खान की गेंदों पर जो भारतीय खिलाड़ी सबसे ज्यादा प्रहार करता था वह नवजीत सिद्धू हीं था। इसी तरह भारत के पं० बंगाल क ा आदमी बांगलादेश की जीवन शैली के ज्यादा करीब पाता बजाए कि एक महाराष्ट्रियन के। जाहिर है ये दोनो हिस्से उसी भूतपूर्व अखंड भारत के ही हिस्से है। फिर इनकी संस्कृति जो सैकड़ों साल से चली आ रही है उसमें सरहद कैसे दीवार खड़ी कर देगा। भारत व पाकिस्तान के बीच की तनातनी कश्मीर को लेकर नहीं है, मूल समस्या विभाजन को लेकर है। यह बात पाकिस्तान के क ट्टरपंथियों और अब भारत के भी कुछेक क ट्रटरपंथियों को भी नागवार लगेगा। परंतु यह बात सोलह आने सच है जिसकी बीज ब्रिटिश बोकर आए और इसका नतीजा हमारे हजारों नौनिहाल सैनिकों के बलिदान से भुगतना पड़ा है। पाकिस्तान को यदि कश्मीर मिल भी जाए तो फिर भी उसके अंदर के आंतरिक अलगाव की आग बुझने वाली नहीं। परंतु भारत को कश्मीर हमारा अटूट हिस्सा है यह कहने के बजाए पूरे अखंड भारत का अलाप जगाना होगा जिसकी आधारभूमि जम्हूरियत, इंसानियत और गैरमजहबियत पर आधारित हो।