कुछ पर काफी मेहरबान तो कुछ को सिर्फ शंटिंग पोस्ट
September 9, 2018 • Manohar Manoj Kumar

यो तो मोदी सरकार की सभी योजनाओ की डिजाइनिंग को मै बेहतरीन मानता हूँ परन्तु उनके मंत्रिमंडल गठन की शैली मुझे कभी पसंद नहीं पड़ी। उनके मंत्री मंडल से साफ पता चलता है वह कुछ पर काफी मेहरबान रहते है तो कुछ को सिर्फ शंटिंग पोस्ट देते है। मंत्रियो के मिले प्रभार से ये लगता है की किसी विभाग को काफी महत्व देते है तो किसी की घोर उपेक्षा करते है। किसी एक राज्य मंत्री के पास कई कई विभागों से जुड़े मंत्रालय होते है तो किसी एक कैबिनेट मिनिस्टर के पास एक छोटा विभाग तक नहीं। जैसे सदानंद गौड़ा एक कैबिनेट मंत्री है पर उनके पास सांख्यिकी मंत्रालय का एक अदना सा विभाग है। मेनका और अब उमा के पास अब अदने अदने विभाग है। एमएसएमई मंत्रालय में कभी एक कैबिनेट और ३ राज्यमंत्री थे अब उसमे केवल एक स्वतंत्र प्रभार का राज्यमंत्री है। सामाजिक न्याय मंत्रालय में अभी भी तीन तीन मंत्री क्यों है। वित्त इतना बड़ा मंत्रालय है इसके बावजूद उन्हें रक्षा मंत्री देने का क्या तुक था। अब जेटली से रक्षा मंत्री का पद ले लिया गया पर अभी भी उनके पास कॉर्पोरेट अफेयर्स मंत्रालय है। मुख़्तार अब्बास नक़वी कैबिनेट मंत्री बनाये गए पर उनका मंत्रालय अल्पसंख्यक की हैसियत एक विभाग बराबर नहीं। 
नए मंत्रिमंडल गठन का सबसे महत्वपूर्ण पहलु यही दिखाई देता है की एक खिलाडी को खेल मंत्री बनाया गया। दूसरा गडकरी को उनके मिहनत और उनके विज़न को इनाम दिया गया। गडकरी जल प्रबंधन के बड़े विजनरी है उन्हें गंगा मंत्री बनाना सही है। पियूष गोयल काबिल मंत्री है , उन्होंने बिजली मंत्री के रूप में अच्छा काम किया। पर रेलवे जैसे मंत्रालय के लिए केवल काबिलियत नहीं पब्लिक विज़न होना बहुत जरूरी है। निर्मला सीतारमण कैबिनेट मंत्री बनने के लिए डिजर्व करती थी, पर जिस तरह से उन्हें रक्षा मंत्री बनाया गया है, उससे तो यह लगता है मोदी सर्कार में टैलेंट पूल कमी है।
भारत के मंत्रिमंडल गठन का इतिहास बताता है की किसी प्रोफेशनल विशेषज्ञ को उससे जुड़े विभाग का मंत्री नहीं बनाया जाता है क्योंकि यह माना जाता है की इसमें उन के वेस्टेड इंटरेस्ट छिपे होते है। हर्षवर्दन चिकित्सक थे पर उनसे स्वस्थ्य मंत्रालय ले लिया गया। पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह रक्षा मंत्री बनाये जाते ना की विदेश राज्य मंत्री। पहले राजीव गांधी पायलट राजेश को परिवहन मंत्री बनाते थे और ट्रांसपोर्टर जगदीश टाइट लर को उड्डयन मंत्री। जाहिर है वेस्टेड इंटरेस्ट रोकना मुख्य मकसद था। 
नए गठन में मोदी ने अभी भी रेलवे, पेट्रोलियम जैसे बड़े मंत्रालय के साथ इनके मंत्री के पास एक और बड़ा मंत्रालय दे रखा रखा है। यह कभी भी विभाग के साथ न्याय नहीं कर सकता। नरेंद्र तोमर और स्मृति ईरानी पर भी मोदी मेहरबान है क्योंकि इतने मंत्री शामिल करने के बाद भी इनके पास दो दो मंत्रालय है। कुल मिलकर एक समवेत दृष्टि दिखाई नहीं पड़ती। एक सेलेक्टिव पोलिटिकल मैनेजमेंट दिखाई पड़ता है। दो नामचीन ब्यूरोक्रेट को उनके पेशेवर कम्पीटेंस के आधार पर मंत्री बनाना सही है। पर मोदी जी आपको केवल नौकरशाहों में ही पेशेवर कम्पीटेंस क्यों दिखता है,समाज में पत्रकार सहित कई क्षेत्रो में पेशेवर कम्पीटेंस मौजूद है। विडंबना ये है विपक्ष में हर राजनेता कों नौकरशाह व्यस्था का सबसे बड़ा दुश्मन लगता है , जनता का विरोधी दिखता है , पर वही राजनेता सत्ता में आता है तो वही नौकरशाह उसका सब से प्रिय और जनता अप्रिय लगने लगती है।