कंपनी दिवालिया कानून के तीन साल: उम्मीदें जगीं पर कई निपटान बाकी
September 10, 2019 • Manohar Manoj

कंपनी दिवालिया कानून के तीन साल: उम्मीदें जगीं पर कई निपटान बाकी

मनोहर मनोज

देश में कारपोरेट भ्रष्टाचार व वित्तीय धोखाधड़ी के अनेकानेक मामलों पर कार्रवाई के लिए लाये गए कंपनी दिवालिया कानून यानी आईबीसी के ठीक तीन साल पूरे हो गए। इस दौरान इस कानून के जरिये गठित इसके नियामक प्राधिकरण आईबीबीआई और इसके न्यायिक निपटान के लिए गठित एनसीएलटी अपनी तमाम गतिविधियों के लिए सुर्खियों में रहीं। कहना ना होगा इस कानून  के जरिये देश में बैंकों व वित्तीय संस्थाओं से कर्ज लिए गए भारी भरकम फंड जो चुकता ना होने की स्थिति में एनपीए बन चुके थे, उनके ही निपटारे की योजना प्रमुख रूप से बनायी गई थी। परंतु बाद में इस कानून और इसके अनुपालन की नियामक संस्था आईबीबीआई और न्यायिक संस्था एनसीएलटी के जद में कई रियल इस्टेट कंपनियों की प्रीलांच स्कीमों  के निवेशकों को भी शामिल किया गया। अब तो इस कानून में विदेशी निवेशकों के डिफाल्टर मामलों तथा देशी कंपनियों के विदेश स्थिति डिफाल्टर मामलों को शामिल करने का केन्द्र सरकार विचार कर रही है। इतना ही नहीं देश में पोंजी फाइनेंस स्कीमों के  तहत लोगों को ज्यादा रिटर्न देकर पैसे ऐंथे जाने के अनगिनत मामले को भी इसके तहत लाकर इस कानून की प्रभावशीलता व इसके दायरे को बढाया जा रहा है।

गौरतलब है कि इन्हीं पिछले तीन साल के दौरान देश में रियल इस्टेट कंपनी के नियमन व संचालन के लिए रियल इस्टेट रेगुलेशन एक्ट यानी रेरा भी लाया गया। देश में एनसीएलटी व बैंकरप्सी कोर्ट की स्थापना में बढोत्तरी कीे गई। परंतु इन सबके बावजूद देश में इतने बड़े पैमाने पर मचे कारपोरेट भ्रष्टाचार, इतनी सारी बैंक धोखाधड़ी और तमाम उद्योगों में कर्ज व निवेश हड़पी प्रवृतियों के मुकाबले इस चर्चित दिवालिया कानून को अभी सिर्फ सांकेतिक शुरूआत  ही माना जा सकता है। बताते चलें कि इसी कानून के आलोक में देश में सुप्रीम कोर्ट और आरबीआई की भी आपस में आंख मिचौनी चलती रही है। जब रिजर्व बैंक बैंक डिफाल्टरों पर कड़ी कार्रवाई का फरमान जारी करता है तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट किसी न किसी याचिका के बहाने लोन वसूली की प्रक्रिया पर नरमी बरतने का आदेश जारी कर देता है। जब रिजर्व बैंक किसी बैंक के कारपोरेट ग्राहक कंपनी की निजता का हवाला देते हुए उनके डिफाल्ट केस को गोपनीय रखता है तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट उन  डिफाल्टरों की सूची सार्वजनिक करने के आदेश दे देता है। गौरतलब है कि इन्हीं वजहों से पिछले दो सालों के दौरान देश में क र्जदार कंपनियों से वसूली व उनकी परिसंपत्त्यिों के पुनर्गठन की प्रक्रिया कभी तेज देखी गई तो कभी सुस्त पड़ गई। वर्ष २018 के दौरान वसूली व निपटारे की प्रक्रिया तेज थी तो वही मौजूदा साल में यह पुन: धीमी पड़ चुकी है। बताते चलें कि मई 2016 में अस्तित्व में आने के बाद आईबीबीआई में कर्ज निपटारे के लिए अबतक करीब 1500 कर्जदार कंपनियों के मामले इस संस्था में निपटारे के लिए सूचीबद्ध हुई हैं। इनमे से करीब 500 कंपनियों के मामले अबतक निपटाये जा चुके हैं। इसके तहत करीब चालीस प्रतिशत एनपीए या तो समाप्त हो चुके हैं या इनका समाधान फार्मूला लाया गया है। इन्सोल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड आफ इंडिया द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक बाकी एक हजार कंपनियों के मामलों में वह अभी इनके लिए नियुक्त इन्सोलवेंसी प्रोफेशनल्स यानी आईपी क ी रिपोर्ट का इंतजार कर रही है या इन पर एनसीएलटी कोर्ट के फैसलों का इंतजार कर रही है। आईबीबीआई का कहना है कि उसका मकसद कर्ज में फंसे कंपनियों से कर्जदाता व ग्राहकों के पैसे केवल रिकवर करना नहीं है बल्कि उससे पहले उनकी व्यावसायिक व वित्तीय संरचना को निर्धारित नौ महीने की अवधि में पटरी पर लाने में मदद करना है। यदि यह प्रक्रिया सफलीभूत नहीं हो पाती है तब उनकी परिसंपत्ति को लिक्वीडेट कर उसे निवेशकों व कर्जदाताओं को वापस देने की पहल की जाती है।

इस दिवालिया कानून की प्रक्रिया में सबसे बड़ी क मी बैंकरप्सी न्यायालयों में जजों की पयाप्त संख्या नहीं होना है। गौरतलब है कि आईबीसी कानून के तहत देश भर में 24 दिवालिया निपटान कोर्ट स्थापित किये जाने थे परंतु इसमे अभी तक केवल 14 कोर्ट स्थापित किये गए हैं। इसमे भी दो कार्यशील नहीं हैं। इनके लिए करीब  60 जजों की जरूरत है परंतु उपलब्धता अभी केवल 21 जजों की है। इन्ही सब वजहों से देश के सवोच्च बैंक आरबीआई के आईबीसी में दर्ज करीब दो लाख करोड़ की फंसी 12 मामलों में से अबतक केवल पांच मामलों का ही निपटान हो पाया है। कुल मिलाकर लब्बोलुआब ये है कि किसी भी समस्या के निपटान के लिए केवल कानून बना देने या उसकी नियामक संस्था गठित कर लेना पर्याप्त नहीं है बल्कि इसके साथ उसकी समवेत आधारभूत संरचना निर्मित करना बेहद आवश्यक है। इसके लिए सरकार को पर्याप्त राजनीतिक इच्छाशक्ति भी दर्शाने की जरूरत है। यह बात हम जरूर कह सकते हैं कि आईबीसी के बदौलत पचास हजार करोड़ के कर्ज में डूबी कंपनी एस्सार स्टील वेदांता स्टील के जरिये व करीब पच्चीस हजार करोड की कर्जदार भूषण स्टील टाटा स्टील के जरिये अधिग्रहित हो पायी हैं। इसी तरह से रियल इस्टेट नियामक प्राधिकरण यानी रेरा की बात की जाए तो मई 2017 में इसक ी शुरूआत के बाद से इसे अबतक देश के केवल दस राज्यों व 5 संघ शासित प्रदेशों ने अपनाया। दूसरी तरफ देश में स्थित करीब दस लाख रियल इस्टेट कार्यरत कंपनियों से अबतक केवल पैतीस हजार      कंपनियों ने इसमे अपना पंजीयन कराया है। गौरतलब है कि जून 2018 में इस दिवालिया कानून के तहत अध्यादेश के जरिये जब अपना प्रोजेक्ट पूरा नहीं करने वाली रियल इस्टेट कंपनियों को भी शामिल किया गया तो उनके निवेशकों में एक बड़ी आस जगी। परंतु निर्धारित नौ महीने की अवधि बीत जाने के बावजूद इन कंपनियों के नियुक्त आईपी इसका निपटान नहीं कर पाए हैं। जेपी, आम्रपाली व एएमआर जैसे रियल इस्टेट समूह जिनमे करीब पचास हजार निवेशकों के करीब एक लाख करोड़ फंसे पड़े है, जब उन्हें इस दिवालिया कानून से राहत नहीं मिल पाई तब उन्हें सुप्रीम कोर्ट की शरण में जाना पड़ा ।

देखा जाए तो आईबीसी कानून के जरिये देश में करीब सात लाख करोड के एनपीए तथा रियल इस्टेट व फाइनेंस कंपनियों द्वारा करोड़ों निवेशकों के करीब दस लाख करोड रुपये रिकवर होने की आस लगी हुई है। ऐसे में विश्व बैंक का यह आंकडा हमे यह जरूर आस बढाता है कि भारत में  फंसी पड़ी बैंक या अन्य परिसंपत्ति की पहले औसत निपटान अवधि 4.3 साल और इनकी रिकवरी दर केवल 26 फीसदी हुआ करती थी वह अब आईबीसी के आगमन के बाद घटकर औसतन 1.5 साल तथा रिकवरी दर 48 फीसदी हो गई है।