अगली बड़ी चुनौती व्यवस्था परिवर्तन की
September 10, 2019 • Manohar Manoj

अगली बड़ी चुनौती व्यवस्था परिवर्तन की

मनोहर मनोज

इस लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी नीति एनडीए को मिली अप्रत्याशित बड़ी विजय ने एक साथ कई मिथकों को तोड़ा है। दूसरी तरफ इस विजय ने नयी सरकार के लिए एक ऐसी चुनौती लेने का अवसर भी प्रदान किया है जो देश की समूची सार्वजनिक व्यवस्था की रीति नीति में बुनियादी व प्रभावी बदलाव लाने की बात उठाती है। पहले तो इस चुनाव के परिणामों के जरिये उन स्थापित मान्यताओं के ढ़ह जाने तथा भारत के लोकतंत्र की अबतक की यात्रा से उपजी नयी मान्यताओं का जिक्र किया जाए जिससे इस भारत राष्ट्र राज्य के लिए बुनियादी बदलाव की आशा नये सिरे से जगी है। कहना ना होगा इस परिणाम ने तमाम विश£ेषकों और विपक्ष के सभी राजनीतिक प्लेयरों को इस बात के लिए भोचक्का कर दिया कि देश में सामाजिक न्याय,धर्मनिरपेक्षता और राजनीतिक वंशवाद के इर्द गिर्द मचने वाली भारतीय राजनीति के अबतक के तमाम ताम झाम बेमानी कैसे हो गए हैं। इस सतरवी लोकसभा चुनाव के दौरान पहले विपक्ष को तो यही लगा था कि मोदी सरकार भी 2019 का चुनाव विगत के बाजपेयी सरकार के 2004 की तरह हार जाएगी। उन्हें यह लगा कि भारत की परंपरागत राजनीति के तहत जातीय समीकरणों और दलीय गठबंधन भाजपा के सामुदायिक अपील को इस बार जरूर ध्वस्त कर देंगे। परंतु विपक्ष यह बात भूल गया कि बहुसंख्यक सामुदायिक पहचान पर अवलंबित इस एनडीए दल की सरकार ने अपनी तमाम कुशल योजनाओं के जरिये आम जनता तथा बहुत हद तक मध्यवर्ग के दिलोदिमाग पर अपनी एक खास जगह स्थापित कर चुकी थी।  लेकिन हमे यहां यह भी कहना पड़ेगा कि दिसंबर 2018 में तीन राज्यों में हार के बाद यह मोदी नीत एनडीए जनवरी 2019 तक राजनीतिक रूप से बैकफूट पर थी। परंतु अंतरिम बजट के दौरान मोदी सरकार द्वारा अपनी हार की समीक्षा के उपरांत लिएतमाम फैसलों जैसे कि आनन फानन में उंची जातियों के लिए संविधान संशोधन के जरिये लाया गया 15 प्रतिशत आरक्षण, रेलवे में करीब एक लाख नयी नौकरी देने का फैसला, अंतरिम बजट में किसानों के लिए पेंशन सरीखी प्रति माह 500 रुपये की माहवारी राहत राशि की घोषणा, मध्य वर्ग को ध्यान में रखते हुए आयकर की सीमा में करीब दो लाख की बढ़ोत्तरी, कामगारों के लिए न्यूनतम 3000 पेंशन की रूपरेखा तय करना, गन्ना किसानों के भुगतान को तीव्र करने के लिए चीनी की राजकीय कीमतों में बढ़ोत्तरी करना प्रमुख रहा। इन सारी घोषणाओं के इतर एनडीए सरकार की संभावनाओं को पंख तब लग गए जब पुलवामा की घटना हुई और इसके प्रत्युत्तर में भारतीय हवाई सेना द्वारा पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर किये गए हमले से भारत के मतदाताओं में राष्ट्रवाद की एक नयी एड्रेनलीन दौड़ गयी। यह ठीक है कि देश में हर चुनाव के दौरान उस समय की तात्कालिक घटनाएं और उसकी राजनीति के अपने अपने अपने फार्मूले रहे हैं। पर हमारी लोकतांत्रिक राजनीति के स्थायी तत्व जैसे पहचान के कारकों मसलन जाति, धर्म, कुनबा , यह अभी कोई ढह नहीं गया है। इसी तरह मनी मसल पोपुलिज्म का गाहे बगाहे जोर आज भी कायम है। उकसाउं, भडक़ाउं, मनभाउं चुनावी भाषणों के नित नये आयाम गढे जा रहे हैं।

अभी इस चुनाव में एनडीए के पक्ष में मत व्यक्त करने वाले विश£ेषक यह कह रहे हैं कि इस चुनाव में जाति की दीवार ढही है। परंतु यह मान्यता अभी तो बिल्कुल हीं गलत है। दरअसल ये लोग ऐसा कह कर तमाम जातियों से गुंथे अपने इस बहुसंख्यक समुदाय की वोट बैंक एकता को हवा दे रहे हैं। भारत की राजनीति में ये सभी तत्व तबतक मलीन नहीं होंगे जबतक देश में केवल गुड गवर्नेन्स व पुरजोर कोशल के साथ प्रदर्शन करने का प्रतियोगी मानक राजनीतिक दलों के बीच स्थापित नहीं होता। परंतु इतने अजेय बहुमत से आयी मोदी सरकार से तो अब इस राजनीतिक व्यवस्था में आमूल चूल बदलाव लाने की आशा सर्वोपरि है। कहना ना होगा देश में अभी तमाम सुधारों की जरूरत है परंतु शुरूआती सुधार तो किसी भी सरकार को राजनीतिक सुधारों के जरिये करनी चाहिए। दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में अब तो हमारी यही उम्मीद है कि भविष्य में भारत की बहुदलीय प्रतियोगी राजनीति का आधार केवल सुशासन, नैतिकता व योगयता पर अवलंबित हो।

इसके बाद अब हम व्यवस्था परिवर्तन के दूसरे बिंदू प्रशासनिक सुधार की बात करें तो इस बाबत मोदी सरकार को समझना चाहिए कि उसकी गेम चेंजर योजनाएं जिन्होंने जनता के दिलोदिमाग पर अपनी छाप छोड़ी और उन्हें अभी विजय श्री प्रदान की हैं, उनमें से कई योजनाएं तो इस देश की प्रशासनिक व्यवस्था की विरूपता की शिकार रही हैं। मसलन उजाला योजना के तहत बांटे गए अरबों बल्ब अधिकतर फ्यूज क्यों हुए। उज्जवला के तहत गरीबों में बांटे गए गैस सिलेंडर की दोबारा रिफील नहीं हो पाई, जाहिर है उनके पास इसके लिए वैकल्पिक आमदनी नहीं रही होगी। इसी तरह कौशल विकास योजना में प्रशिक्षण के नाम पर करोड़ों रुपये का बंदरबांट कैसे हो रहा था। ठीक है कि देश में करीब दस करोड़ शौचालय बनाए गए, परंतु उनकी गुणवत्ता में घालमेल और रखरखाव की दिक्कतें क्या हमारी व्यवस्था के मसले नहीं हैं। क्या मोदी सरकार को यह नहीं तस्दीक नहीं करनी चाहिए कि उसकी सरकार में हो रहे निर्माण कार्य में कमीशन की संस्कृति कायम क्यों है। जाहिर है ये सभी बातें प्रशासनिक व्यवस्था में आमूल चूल बदलाव लाने की बात करती हैं। क्या यह सही नहीं है कि देश के सभी पचीस लाख दफतरों में कर्मचारियों और जनता के बीच एक नयी प्रशासकीय प्रबंधन प्रणाली स्थापित की जाए जिससे शिकायतों का त्वरित निपटारा हो। चाहे देश में एक नयी कार्मिक नीति बनाने की बात हो, एक व्यापक नियुक्ति नीति लाने की बात हो, एक व्यापक उत्पादकता युक्त वेतन नीति हो, एक व्यापक इमानदारी व सेवा भावी कार्य संस्कृति की बात हो, से सभी देश में एक नयी व्यवस्था बनाने की बात करती है जिनका समाधान मौजूदा सरकार को करना है जिसके लिए जरूरी जनादेश मिल चुका है। यदि सरकार उपरोक्त सुधार लाती है तो सरकारी क्षेत्र में खाली पड़े 22 लाख पदों को भरने में भी मोदी सरकार को गुरेज नहीं करना चाहिए।

आर्थिक व्यवस्था की बात करें तो मोदी सरकार को अपनी जीत से यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उसका नोटबंदी, जीएसटी के बुनियादी प्रारूप का फैसला सही था। आखिर विपक्ष को इस सरकार के खिलाफ बेरोजगारी का सबसे बड़ा हथियार भी इन्हीं दो फैसलों से उपजा था। देश में अभी कई महकमों में मंदी की स्थिति है। रोजगार, आय, मांग, उपभोग, निवेश और उत्पादन का चक्र अवरूद्ध हो गया है। कहीं ना कहीं इस देश में नयी आर्थिक नीति के बाद से विकास दर के जरिये आमदनी, राजस्व व निर्धनता उन्मूलन के लिए स्थानांतरित धन पर टिका भारत का निर्धनता उन्मूलन का अभियान अभी अवरूद्ध हुआ है। इसे एक नये व ताजे हवा के झोंके की जरूरत है। इन सबके इतर देश के तमाम सार्वजनिक संस्थाओं व उसकी व्यवस्थाओं  मसलन न्यायपालिका, पुलिस, मीडिया, शिक्षा, स्वास्थ्य और गैर सरकारी संगठनों की समूची कार्य प्रणाली को पूर्ण जनोन्मुखी बनाने की दरकार इस दूसरी मोदी सरकार से प्रबल रूप से कायम है।